
Right To Recall: आम आदमी पार्टी के अंदर एक राजनीतिक तूफान खड़ा हो गया है. दरअसल राघव चड्ढा और राज्यसभा के 6 दूसरे सदस्यों ने पार्टी से अलग होकर भारतीय जनता पार्टी के साथ जुड़ने का फैसला किया है. इस कदम के बाद पंजाब के मुख्यमंत्री Bhagwant Mann ने यह कह दिया है कि वह राष्ट्रपति से मिलकर इन सांसदों के रिकॉल की मांग करेंगे. लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या इस प्रक्रिया से नेताओं को सचमुच वापस बुलाया जा सकता है? आइए जानते हैं क्या होता है राइट टू रिकॉल बिल.
क्या है राइट टू रिकॉल बिल?
राइट टू रिकॉल एक प्रस्तावित लोकतांत्रिक व्यवस्था है. यह मतदाताओं को यह अधिकार देती है कि वे अपने चुने हुए प्रतिनिधियों को उनका कार्यकाल समाप्त होने से पहले ही हटा सकें. दिलचस्प बात यह है कि हाल के दिनों में इस विस्तार की जोरदार वकालत खुद राघव चड्ढा ने ही की थी. इस अवधारणा का मूल विचार यह है कि सांसदों, विधायकों या फिर स्थानीय प्रतिनिधियों को अपने पूरे कार्यकाल के दौरान जनता के प्रति जवाबदेह बने रहना चाहिए, न सिर्फ चुनावों के दौरान.
क्या भारत में राइट टू रिकॉल कोई कानून है?
असलियत यह है कि भारतीय संविधान में सांसदों या फिर विधायकों को रिकॉल का कोई भी प्रावधान मौजूद नहीं है. भले ही सुनने में यह विचार काफी ज्यादा शक्तिशाली लगता हो लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है. इसका मतलब यह है कि फिलहाल मतदाता किसी मौजूदा सांसद को रिकॉल प्रक्रिया के जरिए सीधे तौर पर नहीं हटा सकते.
सांसद पार्टी बदलते हैं तो क्या होगा?
दरअसल जिसे रिकॉल कहा जा रहा है वह असल में दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता घोषित किए जाने का मामला है. राजनेता रिकॉल शब्द का इस्तेमाल सांसद को अयोग्य ठहरने के लिए कर रहे हैं. संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यह कानून उन सांसदों के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति देता है जो अपनी पार्टी बदलते हैं.
भारत में यह अवधारणा कहां मौजूद है?
भले ही यह व्यवस्था सांसदों या फिर विधायकों पर लागू नहीं होती लेकिन रिकॉल प्रणाली सीमित रूप से मौजूद जरूर है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और हरियाणा जैसे कुछ राज्यों में स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों जैसे सरपंच या वार्ड सदस्यों के लिए रिकॉल के प्रावधान मौजूद है.
रिकॉल के विचार का इतिहास
यह विचार कोई नया नहीं है. भारत में इसका प्रस्ताव सबसे पहले 1944 में एम एन रॉय ने रखा था. बाद में जयप्रकाश नारायण और वरुण गांधी जैसे नेताओं ने भी निजी विधेयकों के जरिए से इसके लिए जोर दिया लेकिन इनमें से कोई भी कानून नहीं बन पाया.