नागमंदिर में मुख्य पुजारी महिला, एक के बदले 5 पेड़… हरा-भरा केरल यूं ही नहीं है खास

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बचपन में सीखी हुई कुछ बातें उस समय बहुत साधारण लगती हैं. हमें पता ही नहीं चलता कि वे चुपचाप हमें जीने का तरीका सिखा रही हैं. फिर कई साल बाद वही छोटी-सी याद अचानक लौटती है और हमें समझ आता है कि शायद बचपन में हम कुछ ऐसा समझ गए थे, जिसे बड़े होकर हम भूल गए. मेरी ऐसी ही एक याद केरल की है. मैं ऐसे वातावरण में बड़ा हुआ, जहां प्रकृति और आस्था दो अलग चीजें नहीं थीं.हरिपाड के पास मन्नारशाला श्री नागराज मंदिर है, जो नाग पूजा के लिए प्रसिद्ध है. मंदिर पेड़ों, रास्तों और पवित्र नागवन से घिरा हुआ है और वहां पेड़ों के बीच हजारों नाग प्रतिमाएं हैं. इस मंदिर की एक खास परंपरा यह भी है कि वहां एक महिला मुख्य पुजारी के रूप में सेवा करती हैं, जिन्हें मन्नारशाला अम्मा कहा जाता है.महिला का मंदिर में इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों?

बचपन में मैंने न पर्यावरण के बारे में सोचा था, न जैव-विविधता के बारे में और न ही इस बात के बारे में कि एक महिला का मंदिर की परंपरा में इतना महत्वपूर्ण स्थान क्यों है. मुझे बस इतना पता था कि वहां लोग धीरे चलते थे, धीरे बोलते थे और पेड़ों को सम्मान से देखते थे. एक बच्चे के लिए शायद इतना ही काफी था.

केरल के कई पुराने घरों के आसपास कावु भी होते थे. पेड़ों और पौधों से भरी छोटी-सी जगह, जिसे पवित्र माना जाता था. हमारे घर के आसपास भी ऐसी जगह थी. शाम को जब घर में दीप जलता था, तो कावु में भी दीप जलाया जाता था. पेड़ केवल पेड़ नहीं थे. वे घर और जीवन का हिस्सा थे. यह माना जाता था कि वहां नागों और दूसरे पवित्र जीवों का वास है. इसलिए लोग वहां जाकर अपनी सुविधा के हिसाब से कुछ भी नहीं करते थे.

दुनिया की हर चीज हमारी नहीं हो जाती

बचपन में मुझे यह सब पूजा लगता था. आज उसी बात में मुझे कुछ और दिखाई देता है. शायद यह एक बच्चे को सिखाने का तरीका था कि दुनिया की हर चीज इसलिए हमारी नहीं हो जाती क्योंकि हम उस तक पहुंच सकते हैं. हमारे आसपास की एक पुरानी परंपरा मुझे आज भी याद है. अगर किसी पेड़ को काटना जरूरी हो, तो उसे बस कुल्हाड़ी से काट देना सामान्य बात नहीं थी. पहले पूजा होती थी. पेड़ से क्षमा मांगी जाती थी. यह माना जाता था कि कोई जीवित चीज हमसे अलग हो रही है. और फिर एक बात का संकल्प लिया जाता था, जो मेरी स्मृति में आज भी बहुत साफ है. अगर एक पेड़ काटा गया, तो उसकी जगह पांच नए पेड़ लगाए जाएंगे. और केवल लगाए नहीं जाएंगे, उनकी देखभाल भी की जाएगी.

मैं यह नहीं कह रहा कि यह पूरे केरल में चलने वाला कोई नियम था. यह हमारे परिवार और हमारे आसपास की स्थानीय परंपरा का हिस्सा था. लेकिन सोचिए, एक बच्चा इससे क्या सीखता है. सीख सिर्फ यह नहीं थी कि ‘पेड़ मत काटो’. असली सीख थी: अगर जीवन से कुछ लेते हो, तो उसकी जिम्मेदारी भी तुम्हारी है.‘एक पेड़ गया, तो पांच पेड़ लगाने हैं’

मुझे उन पांच पेड़ों की बात इसलिए याद रहती है क्योंकि उन्होंने ‘लेने’ का मतलब ही बदल दिया. एक पेड़ गया, तो पांच पेड़ लगाने हैं. केवल लगा देना भी काफी नहीं. उन्हें बचाना है. पानी देना है. उनकी देखभाल करनी है. उन्हें बड़ा होने का समय देना है. जिसने पेड़ काटा, हो सकता है वह कभी उन पांच पेड़ों की छाया में न बैठे. शायद यही उस परंपरा की सबसे बड़ी सीख थी. जिम्मेदारी का मतलब हमेशा अपने लिए कुछ वापस पाना नहीं होता. कभी-कभी हम कुछ ऐसा करते हैं, जिसका लाभ उन लोगों को मिलता है जिन्हें हम जानते तक नहीं.

क्या पेड़ को काटना सच में जरूरी है?

आज जब हम किसी जमीन पर खड़े पेड़ को देखते हैं, तो हमारा पहला सवाल शायद होता है, ‘क्या यह जमीन मेरी है? उस पुरानी सोच में सवाल कुछ और था: ‘क्या इस पेड़ को काटना सच में जरूरी है? एक सवाल अधिकार से शुरू होता है, दूसरा जिम्मेदारी से. पेड़ हमारी जमीन पर खड़ा हो सकता है, लेकिन उसकी छाया केवल हमारी नहीं होती. पक्षी उसका इस्तेमाल करते हैं. छोटे जीव उसमें रहते हैं. उसकी जड़ें मिट्टी को थामती हैं. वह हमें बहुत कुछ देता है, हमसे कुछ मांगे बिना.हमारे पूर्वजों के समझ का तरीका

हमारे पूर्वज शायद कार्बन, जलवायु परिवर्तन या जैव-विविधता जैसे शब्द नहीं जानते थे. लेकिन उनके पास समझ का एक दूसरा तरीका था. कभी जंगल को पवित्र बना दिया गया. कभी सांप को रक्षक माना गया. कभी पेड़ को परिवार की परंपरा का हिस्सा बना दिया गया. वह विश्वास विज्ञान नहीं था. लेकिन उसका असर वास्तविक हो सकता था. लोगों ने सीख लिया था कि कुछ चीजों को छेड़ना नहीं चाहिए. और शायद यहीं आकर पांच पेड़ों की कहानी केवल पेड़ों की कहानी नहीं रह जाती.

कोई हमें प्यार देता है. हम बदले में क्या देते हैं? कोई हम पर भरोसा करता है. क्या हम उस भरोसे की रक्षा करते हैं? हमारे माता-पिता हमें अपने जीवन के कई साल देते हैं. हम उन्हें क्या लौटाते हैं? समाज हमें सड़कें, स्कूल, अवसर और रहने की जगह देता है. हम समाज को क्या देते हैं? हम यह गिनना बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि हमें क्या मिला. शायद बड़े होने का मतलब यह सीखना भी है कि हम पर कितना कर्ज है.‘हम बहुत समझदार हो जाते हैं’

पांच साल का बच्चा भी इसे समझ सकता है. उसे एक पौधा देकर कहिए, इसका ध्यान रखना, तो वह शायद रोज उसे पानी देगा. वह यह नहीं पूछेगा, मुझे इससे क्या मिलेगा? कहीं बड़े होते-होते हम बहुत समझदार हो जाते हैं. और फिर हमारा पहला सवाल होता है, ‘इसमें मेरा क्या फायदा है? शायद उन पांच पेड़ों ने हमें वह बात सिखाई थी, जिसे हम आज भी सीख रहे हैं. अगर जिंदगी ने आपको इतना कुछ दिया है, तो आप आने वाले किसी इंसान के लिए कौन-सी पांच चीजें लगा रहे हैं, बचा रहे हैं और छोड़कर जा रहे हैं?

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