
Moon Survival Challenges: इंसान की फितरत रही है कि जो चीज उसे दूर से ललचाती है, वह उसे पाने की जिद पकड़ लेता है. बचपन में जिस चांद को हम ‘चंदा मामा’ कहकर बुलाते थे, आज उसी को अपनी अगली कॉलोनी (Space Base) बनाने की तैयारी चल रही है. नासा का आर्टेमिस-2 (Artemis-2) मिशन हो, या फिर रूस और चीन की चांद पर बिजलीघर बनाने की प्लानिंग, इंसान अब धरती की ‘लक्ष्मण रेखा’ चीरकर आसमान में घर बसाने को बेताब है.
लेकिन क्या यह इतना सिंपल है? बिल्कुल नहीं. हकीकत यह है कि जिस चांद को हम ठंडी चांदनी और सुकून के लिए जानते हैं, वहां का माहौल इंसान के लिए किसी कालकोठरी से कम नहीं है. वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे ही इंसान पृथ्वी के सुरक्षा कवच से बाहर निकलता है, उसका शरीर किसी ‘एलियन’ की तरह बर्ताव करने लगता है. चांद पर जाने वाले इंसानों के शरीर में होने वाले उन चौंकाने वाले बदलावों ने वैज्ञानिकों को हैरान कर रखा है. आइए आसान भाषा में समझते हैं कि चांद पर रहना इंसान के लिए किस तरह और कितना घातक हो सकता है.
हड्डियों और मांसपेशियों का क्या होता है?
धरती पर गुरुत्वाकर्षण (Gravity) की वजह से हमारी हड्डियां और मांसपेशियां मजबूत रहती हैं क्योंकि उन्हें शरीर का वजन उठाना पड़ता है. लेकिन चांद पर ग्रेविटी धरती के मुकाबले सिर्फ 1/6 हिस्सा है. ऐसे में वहां वजन कम महसूस होने के कारण मांसपेशियों का इस्तेमाल कम हो जाता है, जिससे वे कमजोर होने लगती हैं. बिना वजन और दबाव के हड्डियां अपनी डेंसिटी (मजबूती) खोने लगती हैं. अंतरिक्ष में रहने वाले एस्ट्रोनॉट्स हर महीने अपनी हड्डियों का करीब 1 से 2 प्रतिशत हिस्सा खो देते हैं.