– यहां समय की गति धीमी हो जाती है. कुछ घंटों में नाखून और बाल असामान्य तरीके से बढ़ जाते हैं
– कैलाश के गर्भ क्षेत्र पहुंचने पर एक अदृश्य दीवार महसूस होती है
– कुछ यात्रियों ने रात में “ॐ” की ध्वनि सुनी और आकाश में नाचते प्रकाश के गोले देखे
– ये आकृति एक पिरामिड जैसी है और यहां असामान्य चुंबकीय प्रभाव पाया गया
ये सारी वो रहस्यमयी बाते हैं, जिसे पवित्र कैलाश पर्वत पर जाने वाले बहुत से लोगों ने महसूस किया. कुछ ने इसे किताबों में लिखा. कुल मिलाकर ये जगह अगर बहुत अलौकिक फीलिंग देती है तो इसके रहस्य की भी बहुत सी कहानियां हैं. साइंस का भी इस जगह के बारे में अलग खयाल है. नासा ने इसे
क्षेत्र कहा. किसी को यहां ऊं की आवाजें सुनाई पड़ीं तो किसी को पर्वत के भीतर से मृदंग की आवाज आती हुई लगी.
कैलाश पर्वत को लेकर दुनियाभर के यात्रियों, साधकों और शोधकर्ताओं ने कई अलौकिक और रहस्यमयी अनुभवों के बारे में बताया है.कई यात्रियों ने बताया है कि कैलाश क्षेत्र में समय की गति धीमी हो जाती है. उनके अनुसार, वहां कुछ घंटों में नाखून और बाल असामान्य रूप से बढ़ जाते हैं, जबकि बाहर के समय में ऐसा नहीं होता. स्वामी प्रणवानंद की किताब “कैलाश-मानसरोवर: ए डिवाइन जर्नी” (2014) में ये बात कही गई है. रूसी वैज्ञानिक डॉ. अर्नस्ट मुल्दाशेव ने भी अपनी पुस्तक “ह्वेयर डू वी कम फ्राम?” (2002) में भी इस बात का जिक्र हुआ है.
कौन सी शक्ति गर्भ क्षेत्र में आगे बढ़ने से रोकती है
यहां पहुंचे कई लोगों का अनुभव ये रहा कि जब वे कैलाश के गर्भ क्षेत्र (डोलमा ला दर्रे के पास) पहुंचते हैं, तो एक अदृश्य दीवार महसूस होती है, जो आगे बढ़ने से रोकती है. जॉन स्नेलिंग की किताब “द सेक्रेड माउंटेन” (The Sacred Mountain) पुस्तक में तिब्बती साधुओं के हवाले से इसके बारे में कहा गया है. हिंदू ग्रंथ “स्कंद पुराण” (केदारखंड) में कहा गया है, “कैलाश के केंद्र में केवल दिव्य आत्माएं ही प्रवेश पा सकती हैं.”

डोलमा ला दर्रे (5,636 मीटर) के बाद कैलाश के उत्तरी भाग में एक विशेष क्षेत्र है, जिसे “शिव की गुफा” या “गर्भ कुंड” कहा जाता है. यात्रियों को यहां लगता है कि कोई अदृश्य बाधा उन्हें आगे बढ़ने से रोक रही है. कुछ ने घने कोहरे जैसी दीवार या हवा में कंपन महसूस किया. कुछ को यहां सिरदर्द, चक्कर आना या “किसी की मौजूदगी” जैसा अहसास हुआ.तिब्बती इसे “देवताओं का सीमा क्षेत्र” मानते हैं. तिब्बती ग्रंथ “बार्डो थोडोल” रूसी वैज्ञानिक डॉ. अर्नस्ट मुल्दाशेव के अनुसार, कैलाश के आसपास असामान्य चुंबकीय क्षेत्र है. नासा अध्ययनों में यहां “जियोमैग्नेटिक विकिरण” पाया गया, जो मस्तिष्क में भ्रम पैदा कर सकता है. कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि यहां 10 Hz से कम की आवृत्ति वाली ध्वनियां (इन्फ्रासाउंड) पैदा होती हैं, जो मनुष्यों में डर और असामान्य अनुभव पैदा करती हैं.स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपनी पुस्तक “कैलाश-मानसरोवर: एक रहस्य” में लिखा कि उन्होंने डोलमा ला के पास “एक ठंडी हवा का झोंका” महसूस किया, जिसके बाद उनका शरीर सुन्न हो गया. ब्रिटिश पर्वतारोही कॉलिन विल्सन ने दावा किया कि उनके समूह ने “एक चमकती दीवार” देखी, जिसे पार करने की कोशिश करते ही सभी को उल्टी और चक्कर आने लगे.
रात में प्रकाश के नाचते गोले
कुछ यात्रियों ने रात में “ऊं” की ध्वनि और आकाश में नाचते प्रकाश गोले देखने का दावा किया. राहुल सिंह ने स्थानीय शेरपाओं के अनुभवों को लेकर एक किताब लिखी, “माउंट कैलाश: रियलिटी बिहाइंड द मिथ” (2018). इसमें उन्होंने यहीं लिखा कि यहां मंत्रों जैसी आवाजें आती हैं तो रात में आसमान में चमकते गोले उतरते हुए दिखते हैं. तिब्बती बौद्ध ग्रंथ “बार्डो थोडोल” (Book of the Dead) में कैलाश को “दिव्य ध्वनियों का स्रोत” बताया गया.
कई यात्रियों ने डोलमा ला दर्रे के पास आकाश में नाचते प्रकाश (जैसे अरोरा) और घंटियों व मंत्रों की ध्वनि सुनने का दावा किया.
में कहा गया है कि यहां धर्मपाल (रक्षक आत्माएं) अशुद्ध मन वालों को प्रवेश नहीं करने देतीं.
थकान गायब हो जाती है
कुछ यात्रियों ने कैलाश पर्वत के आसपास बिना थकान के लंबी यात्रा करने या अचानक आध्यात्मिक जागृति होने का अनुभव किया. मार्को बैंडिनी ने अपनी किताब “द लास्ट सीक्रेट ऑफ कैलाश” The Lost Secrets of Kailash में लेखक मार्को बैन्डिनी ने वैज्ञानिकों के हवाले से बताया कि यहां चुंबकीय क्षेत्र सामान्य से अधिक है, जो मस्तिष्क पर प्रभाव डाल सकता है.
ये देवताओं का नृत्य स्थल है
“शिव पुराण” में कैलाश को “त्रिकोणात्मक शिवलिंग” कहा गया है, जो ब्रह्मा, विष्णु और शिव का संगम स्थल है. “महाभारत” (वन पर्व) में अर्जुन द्वारा कैलाश की यात्रा का वर्णन है, जहां उन्होंने आकाशवाणी सुनी थी. “द जर्नी टू शांगरी-ला” (तिब्बती भिक्षु लामा अनागारिक गोविंदा) में कैलाश को “देवताओं का नृत्य स्थल” बताया गया है.
शिव पुराण और तंत्रालोक ग्रंथों में बताया गया है कि शिव कैलाश पर देवताओं, यक्षों और गणों के बीच नृत्य करते हैं. इस नृत्य को “आनंद तांडव” (सृजन का नृत्य) और “रुद्र तांडव” (विनाश का नृत्य) से जोड़ा जाता है. जब शिव ने सती के शोक में विध्वंसक नृत्य किया, तो देवताओं ने उन्हें कैलाश पर शांत करने का प्रयास किया.
तिब्बती बौद्ध परंपरा में कैलाश को “कांग रिनपोछे” (रत्न का पर्वत) कहा जाता है. तिब्बती ग्रंथ “बार्डो थोडोल” में कहा गया है कि यहां डाकिनी (दिव्य नर्तकियां) और बोधिसत्व आकाश में नृत्य करते हैं. तिब्बती भिक्षु मानते हैं कि पूर्णिमा की रात कैलाश के आकाश में अदृश्य देव नृत्य होता है, जिसे केवल पवित्र लोग ही देख सकते हैं. तिब्बती योगी लामा गोविंदा ने अपने संस्मरणों में इसे “देव नृत्य का प्रतीक” बताया.एक फ्रांसीसी पर्यटक मिशेल पेस्टल ने दावा किया कि उसने रात में कैलाश के आसपास “सफेद वस्त्रों में नृत्य करते आकृतियां” देखीं, जो गायब हो गईं.
क्या यहां लोग रात में रुकते हैं
यहां रात में रुकने को लेकर भी कुछ चौंकाने वाले नियम और अनुभव हैं. डोलमा ला दर्रे और कैलाश के आंतरिक क्षेत्र में रात रुकना मना है. बाहरी क्षेत्र में यात्री रुक सकते हैं. स्थानीय मान्यता है कि रात में देवी-देवताओं का आगमन होता है, जिसमें मनुष्यों का होना अशुभ माना जाता है. वैसे यहां की रात बहुत ठंड वाली होती है. तापमान -20°C तक रहता है. ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और हिमस्खलन का जोखिम रहता है.
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपनी किताब “कैलाश-मानसरोवर: एक रहस्य” में लिखा कि उन्होंने डोलमा ला के पास रात गुजारने की कोशिश की. आधी रात को “ऊं” की ध्वनि सुनाई दी और नीले प्रकाश ने घेर लिया. लगा जैसे केवल 2 घंटे बीते, जबकि 6 घंटे गुजर चुके थे.
यहां रात में रुकने को लेकर भी कुछ चौंकाने वाले नियम और अनुभव हैं. डोलमा ला दर्रे और कैलाश के आंतरिक क्षेत्र में रात रुकना मना है. बाहरी क्षेत्र में यात्री रुक सकते हैं. स्थानीय मान्यता है कि रात में देवी-देवताओं का आगमन होता है, जिसमें मनुष्यों का होना अशुभ माना जाता है. वैसे यहां की रात बहुत ठंड वाली होती है. तापमान -20°C तक रहता है. ऑक्सीजन की कमी हो जाती है और हिमस्खलन का जोखिम रहता है.
स्वामी सत्यानंद सरस्वती ने अपनी किताब “कैलाश-मानसरोवर: एक रहस्य” में लिखा कि उन्होंने डोलमा ला के पास रात गुजारने की कोशिश की. आधी रात को “ऊं” की ध्वनि सुनाई दी और नीले प्रकाश ने घेर लिया. लगा जैसे केवल 2 घंटे बीते, जबकि 6 घंटे गुजर चुके थे.
रूसी पर्वतारोही सर्गेई सिस्टोव ने रिपोर्ट दी कि रात में अचानक तूफान आया, जिसमें मानवीय चीखों जैसी आवाज़ें सुनाई दीं. उसके GPS और कम्पास ने काम करना बंद कर दिया. सुबह पता चला कि वह मूल मार्ग से 3 किमी दूर था, जबकि उसे याद नहीं कि वह वहां कैसे पहुंचा. हालांकि इसकी वैज्ञानिक व्याख्या ये है कि ऊंचाई पर ऑक्सीजन की कमी से मस्तिष्क मतिभ्रम (Hallucinations) पैदा करता है.

कैलाश का उल्टा पिरामिड
कुछ शोधकर्ताओं का मानना है कि कैलाश पर्वत धरती का एकमात्र प्राकृतिक पिरामिड है, जिसका आधार ऊपर और शीर्ष नीचे की ओर है.
रूसी वैज्ञानिक डॉ. अर्नस्ट मुल्दाशेव ने अपनी किताब “हम कहां से आए हैं?” में इसे “कॉस्मिक पिरामिड” बताया. NASA के कुछ उपग्रह चित्रों में इसकी ज्यामितीय संरचना सामान्य पर्वतों से भिन्न दिखती है. कैलाश पर्वत की छाया सूर्यास्त के समय एक विशालकाय शिवलिंग जैसी दिखती है, जो बर्फ से बनती है.