दुनिया की सबसे ऊंची चोटी नापी तो राधानाथ सिकदर ने, फिर कैसे नाम पड़ा माउंट एवरेस्ट, रोचक है कहानी

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How Mount Everest Got its Name: किसी शहर, राज्य, संस्थान या सड़क का नाम बदलना कोई नई बात नहीं है. किसी न किसी वजह से ऐसा होता रहा है. इसके पीछे अक्सर इतिहास का हवाला दिया जाता है. लेकिन क्या कभी दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट के साथ भी ऐसा हो सकता है. दरअसल इस चोटी का नाम एवरेस्ट जिस अंग्रेज अफसर के नाम पर पड़ा उसका एवरेस्ट से कुछ लेना-देना नहीं था. इस मामले में यही एक ट्विस्ट है. ब्रिटिश भारत के पूर्व सर्वेयर-जनरल रहे कर्नल जॉर्ज एवरेस्‍ट ने संभवतः कभी उस चोटी को नहीं देखा जो उनके नाम पर है. हालांकि तिब्बती लोग इस पर्वत को चोमोलुंगमा और नेपाली लोग सागरमाथा कहते हैं.  

1843 में उनकी सेवानिवृत्ति के समय तक ब्रिटिश सर्वेक्षण दल नेपाल में पहाड़ों को मापने के लिए नहीं गया था. इस प्रकार जॉर्ज एवरेस्ट का उस पर्वत से कोई सीधा संबंध नहीं था जो उनके नाम पर है. हालांकि वह एंड्रयू स्कॉट वॉ को सर्वेक्षण के काम पर रखने के लिए जिम्मेदार थे, जिन्होंने पहाड़ का पहला औपचारिक अवलोकन किया था. केवल जार्ज एवरेस्ट की प्रतिष्ठा के कारण एक पर्वत का नाम उनके नाम पर रखा गया था. यह एक तरह से सर्वेक्षण दल में काम करने वाले लोगों द्वारा उनको सम्मानित करने का तरीका था. 

सिकदर ने 1852 में किया था खुलासा
वास्तव में यह पर्वत दुनिया में सबसे ऊंचा है इसकी खोज एक प्रतिभाशाली भारतीय गणितज्ञ राधानाथ सिकदर ने की थी. राधानाथ सिकदर भारत के ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के लिए काम कर रहे थे. उन्होंने 1852 में खोज की थी कि यह पर्वत दुनिया में सबसे ऊंचा (8,849 मीटर) है. उन्होंने अपने निष्कर्षों की रिपोर्ट एंड्रयू स्कॉट वॉ को दी. चार साल बाद एंड्रयू स्कॉट वॉ ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी का नाम एवरेस्ट के नाम पर रखने का फैसला किया. एंड्रयू स्कॉट वॉ को लगा कि यह उस व्यक्ति के लिए एक उचित सम्मान है जिसने भारत सर्वेक्षण के सबसे बड़े हिस्से की देखरेख की थी. हालांकि खुद जॉर्ज एवरेस्ट ने इसका विरोध किया था. जार्ज एवरेस्ट साल 1830 से 1843 तक सर्वेयर -जनरल रहे. उन्होंने ही राधानाथ सिकदर की नियुक्ति की थी. वह चाहते थे कि ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे का काम शुरू हो सके. सिवाय इसके अंग्रेज अफसर जार्ज एवरेस्ट का एवरेस्ट से कोई संबंध नहीं था.

पहले दिया गया था पीक-15 नाम
ये बात 1850 के आस-पास की है. तब ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे के तहत पहाड़ों की ऊंचाइयां नापी जा रही थीं. इसका हिस्सा राधानाथ सिकदर भी थे. सर्वे में एवरेस्ट की ऊंचाई नापने के बाद उन्होंने इसे पीक 15 नाम दिया. बता दें कि तब तक ये पक्का नहीं हो सका था कि एवरेस्ट ही दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है. बल्कि इसकी जगह कंचनजंघा का नाम लिया जाता था. सिक्किम के उत्तर पश्चिम भाग में नेपाल की सीमा पर स्थित ये चोटी 8,586 मीटर के साथ दुनिया में तीसरे नंबर पर आती है. साल 1865 में सर्वे खत्म होने पर ये बात पक्की हो गई कि माउंट एवरेस्ट ही दुनिया की सबसे ऊंची चोटी है, न कि कंचनजंघा. 

सर्वे मैनुअल से गायब सिकदर का नाम
वैसे दुनिया की सबसे ऊंची चोटी को क्या नाम दिया जाए, ये बहस तब भी हुई थी. कई लोगों का कहना था कि इस पर्वत को स्थानीय नाम दिया जाना चाहिए. हालांकि अंग्रेजों ने इससे इनकार करते हुए अपने ही अधिकारी के नाम पर पर्वत को एवरेस्ट बना दिया. इसके अलावा भी कई तरह की नाइंसाफियां अंग्रेजी कार्यकाल में दिखीं. जैसे सर्वे मैनुअल में राधानाथ सिकदर का नाम ही नहीं था. जबकि सच्चाई यह है कि उन्होंने ही इसके पीक की ऊंचाई का पता लगाया था.

कौन थे राधानाथ सिकदर
राधानाथ सिकदर का जन्म 5 अक्टूबर 1813 को कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में हुआ था. राधानाथ पढ़ाई में शुरू से ही तेज थे और खासकर गणित में उनकी दिलचस्पी थी. कॉलेज से निकलने के तुरंत बाद ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे में उनकी नौकरी पक्की हो गयी. वह 30 रुपये महीने की पगार पर काम करने लगे, जो कि उस वक्त भारतीयों को मिलने वाली तनख्वाह में शानदार मानी जाती थी. काम के दौरान ही जार्ज एवरेस्ट की नजर राधानाथ की प्रतिभा पर पड़ी. जार्ज एवरेस्ट उनसे  लगातार  नए-नए काम लेने लगे. टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक एक मौके पर उन्होंने राधानाथ को अपना दायां हाथ तक कहा था. एवरेस्ट के रिटायरमेंट के बाद एंड्रू्यू स्कॉट वॉ इस पद पर आए. तभी राधानाथ को एवरेस्ट की ऊंचाई नापने का काम दिया गया. राधानाथ ने बगैर एवरेस्ट तक पहुंचे ये पता लगा लिया कि यह सबसे ऊंचा पर्वत है. साल 1852 में ही उन्होंने अपने विभाग को ये डाटा दे दिया था. लेकिन इसे आधिकारिक चार साल बाद किया गया. क्योंकि अंग्रेजों को इस पर भरोसा नहीं हो रहा था. 

कौन थे सर जॉर्ज एवरेस्ट
सर जॉर्ज एवरेस्ट इंग्लैंड से थे और उन्होंने रॉयल मिलिट्री कॉलेज बकिंघमशायर से शिक्षा प्राप्त की थी. इसके बाद वह 1806 में ईस्ट इंडिया कंपनी में कैडेट के रूप में शामिल हुए. उन्हें बंगाल आर्टिलरी में सेकेंड लेफ्टिनेंट के रूप में नियुक्त किया गया और उसी वर्ष वह भारत के लिए रवाना हुए. बंगाल में उन्होंने कर्नल विलियम लैम्बटन के साथ बंगाल के सर्वेक्षण पर काम किया. उनके काम पर ग्रेट ट्रिगोनोमेट्रिकल सर्वे (GTS) के प्रमुख लैम्बटन का ध्यान गया. जिन्होंने उन्हें अपना मुख्य सहायक नियुक्त किया. 1823 में लैम्बटन के निधन के बाद उन्होंने भारतीय सर्वेक्षण विभाग के अधीक्षक का पद संभाला और 1830 में भारत के महासर्वेक्षक यानी सर्वेयर जनरल बने. 1866 में सर जॉर्ज एवरेस्ट का इंग्लैंड में निधन हो गया.

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